अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने और उस पर अपना प्रभाव बढ़ाने की इच्छा जताई, जिससे ग्रीनलैंड बढ़ गया। इसके बाद डेनमार्क के नेतृत्व में ग्रीनलैंड में सैनिक तैनाती की गई। इसमें यूरोप के कई देशों ने भी छोटे‑छोटे सैनिक दल भेजे। उदाहरण के लिए, फ्रांस ने 15 सैनिक, जर्मनी ने 13 और ब्रिटेन ने 1 सैनिक भेजा। यह कदम ग्रीनलैंड की सुरक्षा और क्षेत्रीय नियंत्रण दिखाने के लिए उठाया गया।ट्रंप ने धमकी दी कि अगर यूरोपीय देश ग्रीनलैंड के मामले में अमेरिका का समर्थन नहीं करेंगे, तो उन पर टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया जा सकता है। इस टैरिफ की दर जून तक बढ़कर 25% तक भी जा सकती है। यूरोपीय देशों ने इसे दबाव डालने और ब्लैकमेल करने वाला कदम बताया।

फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन सहित कई देशों ने ट्रंप की इस नीति की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि यह ट्रांसअटलांटिक संबंधों (EU और अमेरिका के रिश्तों) पर नकारात्मक असर डाल सकता है। फ्रांस ने तो यह भी कहा कि अमेरिकी धमकी से उनका निर्णय प्रभावित नहीं होगा और यूरोपीय संघ भी संयुक्त रूप से जवाबी कदमों पर विचार कर रहा है।इटली ने ग्रीनलैंड में भेजे गए छोटे सैनिक दलों को “मज़ाक” बताया। उनका कहना था कि इतने कम सैनिक किसी बड़े असर वाले काम के लिए पर्याप्त नहीं हैं।इस पूरी स्थिति से साफ है कि यह सिर्फ सैनिक तैनाती का मामला नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति का मुद्दा बन गया है। इसमें अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापार, सुरक्षा और क्षेत्रीय नियंत्रण के सवाल जुड़े हुए हैं।इस घटना से यह भी दिखता है कि ग्रीनलैंड जैसी जगहें केवल प्राकृतिक संसाधनों के लिए ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
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